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Poems & Thoughts

A collection of my thoughts, poetry, and reflections.

कौन है माँ, क्या ये वही है जो सिर्फ जन्म देती है, या फिर ये वो है जो हर साँस में हमें ज़िंदा रहने की वजह देती है | क्या माँ बस एक रिश्ता कहलाती है, या हर टूटे पल की मरहम बन जाती है | जो खुद दर्द में रहकर भी हमारी मुस्कान पर अपनी पूरी दुनिया लुटा जाती है। रातों की नींद जो उसने खो दी, सुबह हमारी हँसी में ढल जाती है | हम रोते हैं तो आकाश हिल जाता है, माँ चुप रहती है और खुद से लड़ जाती है | बचपन में उँगली पकड़कर चलाती है, हर गिरावट पर सीने से लगाती है | पहले शब्द से पहले माँ की दुआ हमारी ज़ुबान बन जाती है। स्कूल के पहले दिन हम डर से सहम जाते हैं, पीछे खड़ी माँ आँसू छुपाकर हौसले बनाती है। जवानी आती है हम सपनों में खो जाते हैं, माँ दरवाज़े पर बैठी हर आहट में हमारी सलामती ढूँढ लाती है | हम जीतते हैं तो दुनिया शोर मचाती है, माँ बस माथे पर हाथ रख जाती है | हम हारते हैं तो दुनिया सवाल उठाती है, माँ बिना पूछे सीने से लगा जाती है | उसके सपने कभी उसके नहीं होते, वो हमारे नाम लिखे जाते हैं | उसकी ज़िंदगी के हर पन्ने हमारे भविष्य में खामोशी से जोड़ दिए जाते हैं | वक़्त के साथ माँ थक जाती है, पर फिक्र कभी बूढ़ी नहीं होती | हम समझने में देर कर देते हैं और एक दिन माँ बस याद बन जाती है | माँ कोई शब्द नहीं, कोई भूमिका नहीं, माँ वो एहसास है जो हर रिश्ते से पहले और हर नाम से बड़ी होती है | जो खुद पीछे रहकर हमें आगे बढ़ता देखती है, आख़िरी साँस तक माँ ही रहती है |
पिता कोई कहानी नहीं कहता, वो कहानी बनकर निभाता है। खुद के हिस्से की हर चाहत, चुपचाप वक़्त को सौंप जाता है | वो बोलता कम, सहता ज़्यादा, हर फ़ैसला भारी उठाता है। उसकी ख़ामोशी में हमारी ज़रूरतों का पूरा शहर बस जाता है | सुबह की पहली भागदौड़ है वो, और रात की आख़िरी थकान है | हम जिसे ज़िंदगी कहते हैं, पिता के लिए वो बस ज़िम्मेदारी की पहचान है | बचपन में डाँट बनकर टोकता है, वक़्त के साथ वही ढाल बन जाता है | जो सख़्ती हमें चुभती थी, वही आगे चलकर हमारी रीढ़ बन जाता है | अपने सपनों को वो नाम नहीं देता, उन्हें ज़रूरत कहकर टाल जाता है | हमारी हर छोटी-सी चाह के आगे पिता खुद को पीछे हटा जाता है | हम गिरते हैं तो हाथ नहीं बढ़ाता, बस कहता है—खुद उठ जाओ | और हमें देर से समझ आता है, कि इसी भरोसे से हम मजबूत बन पाओ | उसकी जीत कभी शोर नहीं बनती, उसकी हार भी छुप जाती है। बस हमारी एक ठीक खबर से पिता की पूरी दुनिया मुस्कुराती है | वक़्त के साथ क़दम धीमे पड़ते हैं, पर हौसला वहीं ठहर जाता है | हम आगे बढ़ते चले जाते हैं, और पिता पीछे से रास्ता देख जाता है | पिता कोई कविता नहीं होता, वो जीवन का अनुशासन होता है | जो खुद छाया में जलकर भी हमें धूप से बचाता है, वो आख़िर तक पिता ही होता है |
वो जब भी उसे बयान किया करता था, हर ख़्वाब उसी के नाम किया करता था | नज़र से पहले दिल सलाम करता था, उसकी ख़ामोशी को भी कलाम किया करता था | हँसी उसकी तो दुआ बन जाती थी, और ग़म से पहले एहतियाम किया करता था | वक़्त ठहरता था उसके क़दमों तले, हर लम्हा उसी के नाम किया करता था | जुदाई आई तो शिकवा नहीं किया, बस ख़ुद से ही इंतकाम किया करता था | इश्क़ था, इसलिए बदनाम नहीं हुआ, वो मोहब्बत को भी अदब से जिया करता था |
उसकी झील-सी आँखों में उतरता चला गया, मैं ख़ुद को धीरे-धीरे खोता चला गया | लहराती जुल्फ़ों ने ऐसा असर किया, हर एक साँस पे इश्क़ चढ़ता चला गया | न बचने की ख़्वाहिश थी, न डूबने का डर, मैं जीते-जी उसी का मुक़द्दर होता चला गया |
वो आई, वो मुस्कुराई, लम्हे ठहर-से गए, नज़रें कुछ कह न पाईं, दिल ने बस इतना समझा, और वो चली गई |
अच्छा है किसी ने तो मेरा ग़ुमान तोड़ा था, मुझे भी यक़ीन था कोई मुझे खोने से डरता था | दोस्ती को मैंने शायद ज़रूरत समझ लिया, वरना जो अपना होता है, वो यूँ छोड़ा नहीं करता था |
कौन ही तड़पता होगा एक मुलाक़ात के लिए, जब दिल ही राज़ी हों हर बात के लिए | हम दोनों ने चाहा तो ये इत्तिफ़ाक़ न रहा, मोहब्बत खुद चल पड़ी, दोनों के साथ के लिए |
लोग पूजा करते हैं शिव और पार्वती की, चाहते हैं उनकी जोड़ी वैसी ही पावन और अटूट। पर कौन याद रखता है वह तप, वह विरोध, जब पार्वती ने ठुकरा दी थी जग की हर एक जकड़न और सूत। पिता से भी संघर्ष किया था उन्होंने, अपने प्रेम के लिए अडिग खड़ी रहीं। आज वही समाज प्रश्न खड़े करता है, क्योंकि जाति की दीवारें अभी भी बड़ी रहीं। नाम का धर्म बचा लेते हैं लोग, पर दिलों का धर्म भूल जाते हैं। कहने को मान भी जाते हैं कई, पर निभाने में अक्सर टूट जाते हैं। प्रेम करना सरल लगता है सबको, पर उसे निभाना तप से कम नहीं। कृष्ण–राधा का विरह भी प्रेम है, सीता–राम का वनवास भी कम नहीं। कुछ प्रेम मिलकर भी दूर रह जाते हैं, कुछ विवाह होकर भी बाँट दिए जाते हैं। शायद प्रेम बंधन नहीं, चयन है — जहाँ दो दिल बिना शर्त एक हो जाते हैं। मुझे प्रेम की परिभाषा नहीं आती, पर इतना जानता हूँ — जहाँ स्वार्थ समाप्त होता है, वहीं से प्रेम आरंभ होता है।
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